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फार्मासिस्टों ने किया AIOCD का बंद विफल

नई दिल्ली/लखनऊ/जयपुर/बिलासपुर/मुंबई/रांची

रायपुर के  फार्मासिस्ट अपनी दुकान खोले हुए...
रायपुर के फार्मासिस्ट अपनी दुकान खोले हुए…

ई-फार्मेसी का कथित विरोध के नाम पर देश में दवा दुकान बंद करने के आह्वान करने वाले ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट को उस समय जबरदस्त झटका लगा जब देश भर के फार्मासिस्टों ने अपने-अपने दुकान खोलने शुरू कर दिए। यूपी, मुंबई, बिलासपुर, जयपुर, असम, झारखंड सहित तमाम शहरों से फार्मासिस्टों ने जब अपनी दुकान खोलकर सेल्फी फेसबुक पर अपलोड करना शुरू किया तो केमिस्ट एसोसिएशन को होश उड़ गए। बौखलाए केमिस्ट एसोसिएशन के सदस्यों ने यूपी के कुछ स्थानों पर  व असम में फार्मासिस्टों को डराने की कोशिश की लेकिन फार्मासिस्ट बिना किसी भय के जनहित में अप्नी दुकान खोलने में सफल रहे।
तो फार्मासिस्टों को रास्ते से हटाने के लिए था यह बंद!
दिल्ली से सटे गाजियाबाद में जिस तरह से केमिस्ट एसोसिएशन के लोगों ने प्रदर्शन किया और अपने बैनर पर फार्मासिस्टों की बाध्यता खत्म करने की मांग की उससे यह स्पष्ट हो गया कि एआईओसीडी का मुख्य उद्देश्य फार्मासिस्टों को केमिस्ट दुकानों से हटाना है न कि रियल में ई-फार्मेसी का विरोध।
 
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14 अक्टूबर को ऑल इंडिया ऑर्गानाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (AIOCD) देश भर के दवा दुकानों को बंद कराने जा रही है। बंद के समर्थन में अब तक जहां केमिस्ट एसोसिएशन यह कहते रहे थे कि वे ऑनलाइन फार्मेसी का विरोध कर रहे हैं और उनकी बात सरकार नहीं सुन रही है। इस बावत आज जब नई दिल्ली के प्रेस क्लब में मीडिया से एआईओसीडी के अध्यक्ष जगन्नाथ शिंदे रूबरू हुए तो उनका सुर बदला हुआ नजर आया। उनका कहना था कि यदि ऑनलाइन फार्मेसी को हरी झंडी देनी ही है तो सरकार उनके  साथ मिलकर काम करे। मीडिया के तीखे सवालों का जवाब शिंदे दे नहीं पा रहे थे। जब मीडिया ने पूछा कि क्या आप देश में सस्ती दवाइयों का विरोध कर रहे हैं तो शिंदे व उनकी टीम इसका ठीक से जवाब नहीं दे पायी।
सरकार को व्लैकमेल करने पर उतर आई है केमिस्ट एसोसिएशन
गाजियाबाद में फार्मासिस्टों का विरोध करते केमिस्ट एसोसिएशन के सदस्य
गाजियाबाद में फार्मासिस्टों का विरोध करते केमिस्ट एसोसिएशन के सदस्य

पिछले 6 अक्टूबर को एनपीपीए ने एक पत्र लिखकर दवा संबंधी सभी संगठनों को यह चेता दिया था कि किसी भी सूरत में बंद को स्वीकार नहीं किया जायेगा। वहीं दूसरी तरफ मरीजों की असुविधा का ख्याल रखे बिना केमिस्ट एसोसिएशन अपनी अतार्तिक मांगों को पूरा कराने के लिए सरकार पर अनावश्यक दबाव डालने का प्रयास करती हुए नज़र आई। सूत्रों की माने तो केेमिस्ट एसोसिएशन ऑनलाइन फार्मेसी के विरोध के बहाने इस सेक्टर में खूद की हिस्सेदारी चाहती हैं। वे चाहते हैं कि सरकार कोई ऐसा कदम न उठाएं जिससे उनका मुनाफा कम हो।
सवालों का जवाब नहीं दे पाए एसोसिएशन के सदस्य
जब मीाडिया ने केमिस्टों कर्तव्यों को लेकर सवाल उठाना शुरू किया तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। एआईओसीडी के महासचिव सुरेश गुप्ता ने जब यह कहा कि हमलोगों को लगभग 10 हजार करोड़ रुपये की बची दवाइयां मरीजों से वापस लेनी पड़ती है, लेकिन ऑनलाइन फार्मेसी से लोग बची हुई दवाइयां लौटा नहीं पायेंगे। इस पर काउंटर करते हुए मीडियाकर्मियों ने पूछा कि आपके केेमिस्ट स्ट्रीप से दवाइयां काटकर देते ही नहीं तो फिर आप लौटाते कैसे होंगे? इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं था। उन्होंने एक मुद्दा उठाया कि ऑनलाइन वाले 30 फीसद तक छुट कैसे दे सकते हैं जब रिटेलर को 13.5 फीसद का ही मुनाफा है। उनके इस तर्क के काउंटर में जब स्वस्थ भारत डॉट इन ने उनसे पूछा कि दवाइयों पर जो बोनस मिलता उसपर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? इस सवाल का भी सार्थक कोई उत्तर वे लोग नहीं दे पाए। अपना पक्ष रखते हुए  एआईओसीडी के अध्यक्ष श्री शिंदे ने कहा कि ऑनलाइन फार्मेसी से बच्चों में नशा की लत बढ़ेगी। इस बात में सच्चाई हो सकती है लेकिन क्या किसी भी ऑनलाइन दवा प्रोवाडर को यह अधिकार है कि वह बिना प्रिस्किपसन के शेड्यूल  X व नार्कोटिक दवाइयां दे सकती हैं, क्या उन्हें अधिकार है कि वे बिना जांच पड़ताल के शिड्यूल एच-1 की दवाइयां दें।  सच्चाई तो यह है कि ऐसा वे कानूनन कर ही नहीं सकते और न ही सरकार उन्हें इस तरह खुला रूप से ऐसी दवाइयां बेचने की ईजाजत देगी।  तो फिर विरोध क्यों?
फार्मासिस्ट का अस्तित्व खतरे में!
एक तरफ जहां केमिस्ट एसोसिएशन फार्मासिस्टों बाध्यता को खत्म करने की बात कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ ऑनलाइन फार्मेसी के फार्मेट
राजस्थान में जागृति संस्थान के फार्मासिस्टों ने निकाली रैली
राजस्थान में जागृति संस्थान के फार्मासि्टों ने निकाली रैली

को लेकर फार्मासिस्टों में भ्रम की स्थिति है। ई-फार्मेसी के कॉन्सेप्ट पर न तो सरकार ठीक से गाइड कर रही है और न ही इसका विरोध करने वाले केमिस्ट एसोसिएशन! ई-फार्मेसी का विरोध पूरे देश के फार्मासिस्ट भी कर रहे हैं लेकिन इसके लिए केमिस्ट एसोसिएशन ने जो हथकंडा अपनाया है उसकी वे खिलाफत कर रहे हैं। यहीं कारण है कि 14 के बंद के विरोध में है देश भर के फार्मासिस्ट एसोसिएशन। फार्मासिस्टों की मांग है कि ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 नियम 1945 और फार्मेसी एक्ट 1948 की धारा 42 में कोई भी बदलाव न हो और दवा मरीज के हाथों पहुंचाने व उसकी काउंसेलिंग की जिम्मेदारी हर हाल में उसी के हाथ में हो ताकि लोगों को सुरक्षित हाथों से व्यवस्थित दवा मिल सके।
दुकान चलाने के लिए अधिकारियोें को पैसा देना पड़ता है
एआईओसीडी के महासचिव सुरेश गुप्ता ने कहा कि दुकान चलाने के लिए हमें फार्मासिस्ट का रजिस्ट्रेशन चाहिए होता है और इसे खुद एफडीए के अधिकारी मुहैया कराते हैं, जिसके बदले में केमिस्ट को पैसा देना पड़ता है। यूपी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वहां पर महज 22 हजार फार्मासिस्ट हैं जबकि 72 हजार लाइसेंसी रिटेल की दुकाने हैं। उनके इस जवाब पर जब स्वस्थ भारत डॉट इन ने सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या इन सभी फर्जी व गैरकानूनी दवा दुकानों की लाइसेंस को रद्द नहीं कर देना चाहिए? इस पर उग्र होते हुए उनका जवाब था कि आखिर केमिस्ट ही क्यों निशाना बनें. जिन लोगों ने लाइसेंस दिया है उनको आप मीडिया वाले क्यों नहीं कुछ कहते। इस संदर्भ में उन्होेंने यह भी कहा कि पूरे देश में सिर्फ 1.5 लाख फार्मासिस्ट रिटेलर हैं।
बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति का विरोध
बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति का विरोध करते हुए जगन्नाथ शिंदे कहा कि वे चाहते हैं कि बेतहाशा बढ़ी हुई दवा की कीमतें कम हों और इसके लिए सरकार द्वारा दवाइयों के मूल्यों को नियंत्रित करने का जो फार्म्यूला लाया गया है व जनहित में नहीं है।
ई-फार्मेसी को लॉच करने की साजिश तो नहीं…
जिस तरह से ई-फार्मेसी के मुद्दे को आगे बढ़ाया जा रहा है उससे यह आशंका हो रही है कि ई-फार्मेसी के लिए भारत का बाजार खोलने की पूरी कवायद की जा रही है। इसमें दवा कंपनियों से लेकर, इ-कॉमर्स व आईटी के दिग्गज भी बड़े पैमाने पर अपना भाग्य आजमाने की कोशिश में लगे हैं। जाहिर है कि देश का घरेलू दवा बाजार पिछले 10 वर्षों में 32 हजार करोड़ से बढ़कर 70 हजार करोड़ रूपये का आंकड़ा पार कर चुका है। चूंकि सरकार भी मान चुकी है कि दवाइयों में 1000 फीसद तक का मुनाफा है, तो ऐसे में इन बड़े प्लेयरों का आना स्वभाविक ही लगता है। लेकिन इन सब के बीच में अगर किसी को नुक्सान होने वाला है तो वह  है आम जनता, जिसे मालूम ही नहीं है कि उसके स्वास्थ्य के साथ किस कदर एक्सपेरिमेंट किया जा रहा है! इस संदर्भ में स्वस्थ भारत अभियान का मानना है कि देश का दवा बाजार 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का नहीं होना चाहिए। इसका आंकड़ा 70 हजार करोड़ इसलिए पार कर चुका है क्योंकि दवाइयों में मुनाफाखोरी चरम पर है और उसकी एमआरपी पर सरकार का नियंत्रण लगभग न के बराबर है। पिछले दिनों जिस रफ्तार से ऑनलाइन फार्मेसी का विज्ञापन मीडिया में दिया जा रहा है उससे यह आशंका तो जाहिर की ही जा सकती है कि इस खेल में कहीं सभी (सरकार, दवा कंपनिया व केमिस्ट संगठन) की हिस्सेदारी तो नहीं!
 
 

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