एक सार्थक पहलः स्वस्थ भारत अभियान

भारतीय पक्ष पत्रिका के  नवंबर, 2014 अंक में स्वस्थ भारत अभियान पर आधारित लेख

भारतीय पक्ष पत्रिका के नवंबर, 2014 अंक में स्वस्थ भारत अभियान पर आधारित लेख

स्वस्थ भारत अभियान की चर्चा भारतीय पक्ष  पत्रिका ने अपने नवंबर-2014 अंक में किया है। स्वस्थ भारत अभियान परिवार भारतीय पक्ष पत्रिका को अपना साधुवाद ज्ञापन करता है। ऋतेश पाठक जी ने स्वस्थ भारत अभियान के अभी तक के हस्तक्षेप को बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किया है…आप मित्र भी पढ़ें…

ऋतेश पाठक

आपबीती को चुनौती के रूप में स्वीकारना और फिर उस चुनौती का सामना इस कदर करना कि वह एक अभियान या आन्दोलन का रूप लेने लगे, ऐसा विरले ही होता है, लेकिन जब भी ऐसे प्रयास होते हैं तो उसकी जड़ में समाज को प्रभावित करने वाला कोई न कोई बड़ा प्रश्न होता है और इस कारण ऐसे अभियान को आम लोगों से समर्थन हासिल होने की उम्मीद रहती है। कुछ ऐसा ही हुआ 22 जून, 2012 को जब मुंबई के एक नामचीन अस्पताल प्रशासन की संवेदनहीनता ने स्वास्थ्य संबंधी विषयांे पर पूरे देश को जागृत करने वाले एक अभियान की नींव रख दी।
वाकया कुछ यूं है कि रोजगार की तलाश में एक नौजवान उक्त तिथि को मुंबई पहंुचता है और ठीक उसी दिन मुंबई स्थित अपने मित्र के किसी परिजन को लेकर महानगर के मलाड क्षेत्र में स्थित अस्पताल उसे जाना पड़ता है। इस अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में भर्ती उस मरीज को बाहर से तरल देने के लिए आईवी सेट की जरूरत पड़ती है, जिसके लिए अस्पताल प्रशासन 117 रुपये वसूलता है। दवा कारोबार की पृष्ठभूमि से कुछ हद तक वाकिफ उस युवक को यह बात गोली की तरह चुभती है कि 7 रुपये के आईवी सेट के लिए 117 रुपये वसूले जाते हैं। वह नौजवान अपनी पीड़ा सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के माध्यम से व्यक्त करता है और देखते ही देखते उस पोस्ट को हजारों लोग पसंद तथा साझा कर डालते हैं। यही घटना स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर केन्द्रित एक अभियान की आधारशिला बन जाती है, जिसे आज ‘स्वस्थ भारत अभियान’ का नाम मिला है और यह सुखद संयोग भी है कि आशुतोष कुमार सिंह नाम के उसी नौजवान को ‘भारतीय पक्ष’ के इस स्वास्थ्य विशेषांक का अतिथि संपादक होने का गौरव मिला है।
‘सब चलता है’ और ‘छोड़ो भी’ के अभ्यस्त इस समाज के बीच आशुतोष चाहते तो चुपचाप अस्पताल का बिल भुगतान कर अपनी आजीविका की चिंता तक सीमित रहते या पत्रकार होने के रौब-दाब से बिल कम करवाने की कोशिश करते, परंतु उन्होंने इन दोनोें से अलग रास्ता चुना और वह रास्ता था अपनी पीड़ा के माध्यम से समाज की पीड़ा को समझने का तथा अपनी अभिव्यक्ति को समाज की अभिव्यक्ति का माध्यम बनने देने का। उन्होंने तय किया कि वह अपनी दिनचर्या, आजीविका के निमित्त अपने कार्यों के अलावा स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर जनजागरूकता के लिए समय जरूर निकालेंगे और यह एक दृढ़ इच्छाशक्ति का ही परिणाम है कि मुंबई जैसे व्यस्त शहर तथा पत्रकारिता जैसे व्यस्त पेशे में होते हुए भी अभियान के लिए उन्होंने नियमित समय निकाला तथा गत लगभग ढाई वर्ष में इसे एक अलग पहचान दी है।
चूंकि पहला वार कीमतों ने किया था, इसलिए अभियान का जन्म दवा मूल्यों को निशाने पर रखकर हुआ और दिसंबर, 2012 में औपचारिक रूप से फेसबुक पर कंट्रोल एमएमआरपी (कंट्रोल मेडिसिन मैक्सिमम रिटेल प्राइस) अभियान शुरू हुआ। इस अभियान के तहत कई चिकित्सा व फार्मेसी पेशेवर भी साथ आये और लोगों ने दवाओं की वास्तविक कीमतों तथा उनकी बाजारी कीमतों के बीच फर्क पर बहस आम कर दी। इसके साथ पेटेंट दवाओं तथा पेटेंट मुक्त (जेनेरिक) दवाओं के बीच घटकों में समानता तथा कीमतों में व्यापक असमानता का विरोधाभास चर्चा के केन्द्र बिन्दु में आ गया।
कंट्रोल एमएमआरपी अभियान से जुड़े लोगों ने अब दायरा आगे बढ़ाया और पेटेंट दवाओं तथा उनके जेनरिक विकल्पों की सूची तैयार करने का प्रयास शुरू किया गया। जिन जरूरतमंदों को पता चला, उन्होंने डाक्टरों की पर्ची पर लिखी महंगी दवाइयोें के सस्ते विकल्प के लिए इस फेसबुक अभियान का रूख किया और फिर आशुतोष तथा उनके अन्य साथियों के इनबाक्स तथा मोबाइल नंबरों तक भी जरूरतमंदों की पहंुच बनने लगी और इन जुनूनी लोगों ने किसी को निराश नहीं किया। इस बीच अभियान को मीडिया का भी समर्थन मिलना शुरू हुआ और वेब मीडिया से शुरू होकर यह जनसत्ता, प्रभात खबर, चौथी दुनिया, जनदखल समेत प्रमुख समाचार पत्रों-पत्रिकाओं में स्थान पाने लगा। समाचार माध्यमों में इस विषय के प्रति बढ़ती जागरूकता ने अभियान का उत्साह बढ़ाया और लगभग साल भर के अंदर आशुतोष ने इस मुद्दे पर 50 से अधिक लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में खुद लिखे। अन्य लेखकों का रूझान भी इस तरफ बढ़ा और बहस तेज होती मालूम पड़ी।
इस अभियान के समानांतर चल रही कई घटनाओं ने विषय को और भी प्रासंगिक बनाया। ऐसे कई प्रयास पहले से भी हो रहे थे, लेकिन अब उनकी रफ्तार को भी पर लगने लगे थे। एक ओर आमिर खान द्वारा प्रस्तुत धारावाहिक ‘सत्यमेव जयते’ में इस विषय पर चर्चा हुई तो दूसरी ओर एनपीपीए ने पेटेेंट दवाओं के जेनरिक विकल्प बताने के लिए अपनी टोल फ्री हेल्पलाइन शुरू कर दी। कई राज्यों ने सरकारी डाक्टरों के लिए अनिवार्य रूप से जेनरिक दवाएं लिखने के नियम बनाये थे, उन पर थोड़ी कड़ाई हुई तो जहां ऐसे नियम नहीं थे, वहां नियम बनाये गये। यानी दवा कंपनियों के दुर्भेद्य किले की बाहरी व्यूह रचना पर कुछ असरकारी हमले तो होने लगे। भले ही किले का दरवाजा खुला नहीं, यह अलग बहस का मसला हो सकता है।
शायद इन प्रयासों का ही परिणाम था कि सरकार ने 2013 में आवश्यक औषधियों की अपनी सूची को 74 दवाओं से बढ़ाकर 348 तक कर दिया। यहां भी गौर करने की बात है कि इस सूची के बारे में 1995 के बाद पहली बार सरकार की नींद 18 वर्षों के अंतराल पर खुली और उस दौर में खुली जब दवा की कीमतें जन-जन के बीच चर्चा का विषय बनने लगीं। इस सब का असर डाक्टरोें की पर्चियों पर भी थोड़ा बहुत दिखा। यह सच है कि केवल जानकारी से इस समस्या को निर्मूल नहीं किया जा सकता, लेकिन इस अभियान ने उम्मीद की एक किरण जरूर जगायी। सीमित संसाधनों के बावजूद इसकी लोकप्रियता और आमजन से मिलती प्रतिक्रियाओं ने अभियान से जुड़े लोगों का हौसला बढ़ाया और इसका दायरा विस्तृत करने पर अब विचार विमर्श शुरू हो गया।
कंट्रोल एमएमआरपी अभियान को अब फेसबुक की दुनिया से निकालकर फेस टू फेस बनाने की आवश्यकता महसूस हो रही थी। इसको ध्यान में रखकर मुंबई और दिल्ली में गोष्ठियों और विमर्शों का दौर चला, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर लोगों ने अपने अनुभवों के आधार पर अभियान को दिशा देने के प्रयास किये। वार्ताओं में विशेषज्ञों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर अभियान से जुड़े प्रमुख सदस्यों ने महसूस किया कि दवा की कीमतें तो समस्याओं के मकड़जाल मेें उलझे स्वास्थ्य क्षेत्र का एक छोटा सा कोना भर है, वास्तव में इसे व्यापक रूप देकर स्वास्थ्य जगत से जुडे़ विभिन्न विषयों को विमर्श की मुख्य धारा में लाने की जरूरत है।
इन बिंदुओं को ध्यान में रखकर इस वर्ष सितंबर में स्वस्थ भारत अभियान नाम से फेसबुक पृष्ठ बनाया गया और पहले की ही तरह इस प्रयास को भी लोगों ने हाथों हाथ लिया। फेसबुक पर आयी उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया को देखते हुए स्वस्थ भारत डॉट इन नाम से वेबसाइट अक्टूबर में शुरू हुई और इसके माध्यम से स्वास्थ्य जगत के श्याम-श्वेत पक्षों को आमजन के समक्ष लाने का प्रयास किया जा रहा है।

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