SBA विशेष स्वास्थ्य मित्र

…और बिनोद कुमार की पहल रंग लायी

सेमिनार को सम्बोधित करते श्री बिनोद कुमार
हाल में ही दवा के होल सेल लाइसेंस में फार्मासिस्टों की अनिवार्यता को लेकर मीडिया में आई खबर ने फार्मा जगत में तहलका मचा दिया है।जहाँ एक तरफ फार्मासिस्ट संगठनों ने सरकार के इस पहल का भरपूर स्वागत किया वही केमिस्ट संगठनों ने विरोध। ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (DTAB) के इस प्रस्ताव पर कई फार्मासिस्ट संगठन अपना-अपना दावा पेश करते भी नज़र आये। स्वस्थ भारत अभियान की पड़ताल में यह बात सामने आई की होलसेल में भी फार्मासिस्ट की अनिवार्यता की मांग सबसे पहले पटना के वरिष्ठ फार्मासिस्ट बिनोद कुमार ने  वर्ष 2005 में की थी।  पटना के तारामंडल सेमिनार हॉल में सन् 2005 में राष्ट्रीय फार्मासिस्ट सप्ताह मनाया गया था। इस आयोजन में बिनोद कुमार ने होलसेल में फार्मासिस्ट की जरुरत रेखांकित करते हुए सरकार व मीडिया का ध्यान इस विषय की ओर आकृष्ट कराया था। उस सम्मेलन में बिहार के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री सकुनी चौधरी, ड्रग कंट्रोलर संगीत सिंह, इंडियन फार्मासिस्ट ग्रेजुएट एसोसिएशन सेंट्रल कमेटी दिल्ली के वरिष्ठ सदस्यों सहित फार्मा जगत के तमाम दिग्गज मौजूद थे ! बिनोद कुमार एक लम्बे अरसे से रिटेल से साथ साथ होलसेल दवा दुकानों के लिए भी लाइसेंस की मांग करते रहे और इसके लिए सरकार के आलाअधिकारियों से संपर्क स्थापित भी किए। कई बार तो उन्हें विपक्षियों के आलोचना का शिकार होना पड़ा। लेकिन वे अपनी बात से पीछे नहीं हटे। अंततः वर्ष 2012 में इंडियन फार्मासिस्ट ग्रेजुएट एसोसिएशन (IPGA) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अतुल कुमार नासा ने बांकीपुर क्लब  पटना में बिनोद कुमार के इस स्टैंड को जरुरी बताते हुए औपचारिक रूप से इस प्रस्ताव को सरकार के समक्ष रखने की बात कही। आईपीजीए सेंट्रल कमिटी के लगातार प्रयासों के फलस्वरूप पिछले महीने ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड के अधिकारिओं ने इस मसौदे को हरी झंडी दे दी !
फार्मासिस्ट ग्रेजुएट एसोसिएशन, बिहार चेप्टर के अध्यक्ष बिनोद कुमार ने स्वस्थ भारत अभियान से विशेष बातचीत में  बताया कि फार्मा सेक्टर में रोजगार की कमी नहीं है ! दवा के उत्पादन से लेकर वितरण तक में फार्मासिस्टों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। सरकारी लिपापोती के कारण आज भी फार्मासिस्ट दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं ! महज़ ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट 1940 और फार्मेसी एक्ट 1948 को ठीक से लागू कर दिया जाए तो  देश के लाखों बेरोजगार फार्मासिस्टों को रोजगार मिल जाए और आम लोगों को सुरक्षित तरीके से दवा। फार्मेसी प्रैक्टिस रेगुलेशन 2015 के लागू होने से फार्मासिस्टों का मान सम्मान बढ़ेगा !
 
 

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