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60 लाख लोगों को प्रत्येक वर्ष मौत की नींद सुला रहा है तंबाकू

शशांक द्विवेदी

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इस देश और दुनियाँ में हर किसी को पता है कि तम्बाकू स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और इससे कैंसर हो सकता है फिर भी इसका कारोबार देश में तेजी से फ़ैल रहा है । इसकी सबसे बड़ी वजह है परिवार और समाज के स्तर पर जागरूकता का आभाव क्योकि सिर्फ सरकारी स्तर पर विज्ञापन देकर तम्बाकू के उपयोग को कम नहीं किया जा सकता है । समाज में तम्बाकू को लेकर किस तरह संवेदनहीनता है इसका सबसे बड़ा उदहारण ये चुटुकुला है जिसके अर्थ काफी गंभीर है ..

“ एक युवक ने सिगरेट का पैकेट ख़रीदा

उस पर चेतावनी लिखी थी – ”धूम्रपान नपुंसकता का कारण है

वो वापिस दुकान पर गया और बोला कि “ये कौन सा पेकेट दे दिया भाई  ? वो कैंसर वाला दे.”

अब अब इसी से अंदाजा लगा सकते है कि सामाजिक स्तर पर लोगों में कितनी संवेदनहीनता है जबकि वो जानते है कि इससे नुकसान है ।  तम्बाकू से होनें वाले खतरे से बचने के लिए सबसे पहले हमें इसके उत्पादन पर रोक लगानी होगी और इसके रेवेन्यु माडल की व्यापक समीक्षा करनी पड़ेगी । ये तय करना होगा कि भले ही तम्बाकू से कोई राजस्व ना मिले लेकिन गुटका ,सिगरेट को हर जगह प्रतिबंधित किया जाए जिससे कि लोग इसे खाने के लिए हतोत्साहित हो क्योकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार तम्बाकू के कहर से हर साल 60 लाख लोगों की जान जा रही है और लोग सतर्क नहीं हुए तो यह संख्या 80 लाख के पार जा सकती है। भारत में हर साल डेढ़ से दो लाख लोग कैंसर की चपेट में आते हैं। इन लोगों में 70 प्रतिशत तम्बाकू का सेवन अलग-अलग तरीके से करने वाले लोग भी शामिल हैं।

अंतर्राष्ट्रीय तंबाकू निषेध दिवस को तम्बाकू से होने वाले नुक़सान को देखते हुए साल 1987 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सदस्य देशों ने एक प्रस्ताव  द्वारा हर साल 31 मई को तम्बाकू निषेध दिवस मनाने का फ़ैसला किया गया और तभी से 31 मई को तम्बाकू निषेध दिवस मनाया जाने लगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य देशों ने 31 मई का दिन निर्धारित करके धूम्रपान के सेवन से होने वाली हानियों और ख़तरों से विश्व जनमत को अवगत कराके इसके उत्पाद एवं सेवन को कम करने की दिशा में आधारभूत कार्यवाही करने का प्रयास किया है।

दुनियाभर में तम्बाकू सेवन का बढ़ता चलन स्वास्थ्य के लिए बेहद नुक़सानदेह साबित हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने भी इस पर चिंता ज़ाहिर की है। तम्बाकू से संबंधित बीमारियों की वजह से हर साल क़रीब 5 मिलियन लोगों की मौत हो रही है। जिनमें लगभग 1.5 मिलियन महिलाएं शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनियाभर में 80 फ़ीसदी पुरुष तम्बाकू का सेवन करते हैं, लेकिन कुछ देशों की महिलाओं में तम्बाकू सेवन की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है। दुनियाभर के धूम्रपान करने वालों का क़रीब 10 फ़ीसदी भारत में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में क़रीब 25 करोड़ लोग गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का आदि के ज़रिये तम्बाकू का सेवन करते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ दुनिया के 125 देशों में तम्बाकू का उत्पादन होता है। दुनियाभर में हर साल 5.5 खरब सिगरेट का उत्पादन होता है और एक अरब से ज़्यादा लोग इसका सेवन करते हैं। भारत में 10 अरब सिगरेट का उत्पादन होता है। भारत में 72 करोड़ 50 लाख किलो तम्बाकू की पैदावार होती है। भारत तम्बाकू निर्यात के मामले में ब्राज़ील, चीन, अमरीका, मलावी और इटली के बाद छठे स्थान पर है। आंकड़ों के मुताबिक़ तम्बाकू से 2022 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की आय हुई थी। विकासशील देशों में हर साल 8 हज़ार बच्चों की मौत अभिभावकों द्वारा किए जाने वाले धूम्रपान के कारण होती है। दुनिया के किसी अन्य देश के मुक़ाबले में भारत में तम्बाकू से होने वाली बीमारियों से मरने वाले लोगों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। तम्बाकू पर आयोजित विश्व सम्मेलन और अन्य अनुमानों के मुताबिक़ भारत में तम्बाकू सेवन करने वालों की तादाद क़रीब साढ़े 29 करोड़ तक हो सकती है

देश के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि शहरी क्षेत्र में केवल 0.5 फ़ीसदी महिलाएं धूम्रपान करती हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह संख्या दो फ़ीसदी है। आंकड़ों की मानें तो पूरे भारत में 10 फ़ीसदी महिलाएं विभिन्न रूपों में तंबाकू का सेवन कर रही हैं। शहरी क्षेत्रों की 6 फ़ीसदी महिलाएं और ग्रामीण इलाकों की 12 फ़ीसदी महिलाएं तम्बाकू का सेवन करती हैं। अगर पुरुषों की बात की जाए तो भारत में हर तीसरा पुरुष तम्बाकू का सेवन करता है। डब्लूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक़ कई देशों में तम्बाकू सेवन के मामले में लड़कियों की तादाद में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है। हालांकि तम्बाकू सेवन के मामले में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ़ 20 फ़ीसदी ही है। महिलाओं और लड़कियों में तम्बाकू के प्रति बढ़ रहे रुझान से गंभीर समस्या पैदा हो सकती है। डब्लूएचओ में गैर-संचारी रोग की सहायक महानिदेशक डॉक्टर आला अलवन का कहना है कि तम्बाकू विज्ञापन महिलाओं और लड़कियों को ही ध्यान में रखकर बनाए जा रहे हैं। इन नए विज्ञापनों में ख़ूबसूरती और तंबाकू को मिला कर दिखाया जाता है, ताकि महिलाओं को गुमराह कर उन्हें उत्पाद इस्तेमाल करने के लिए उकसाया जा सके। बुल्गारिया, चिली, कोलंबिया, चेक गणराज्य, मेक्सिको और न्यूजीलैंड सहित दुनिया के क़रीब 151 देशों में किए गए सर्वे के मुताबिक़ लड़कियों में तंबाकू सेवन की प्रवृत्ति लड़कों के मुक़ाबले ज़्यादा बढ़ रही है। एक तथ्य के अनुसार जब तम्बाकू जलता है तो वह टार नामक एक विशिष्ट पदार्थ को पैदा करता है जो धुएं के साथ फेफड़ों में जाता है। टार के प्रत्येक कण में नाइट्रोजन, आक्सीजन, हाईड्रोजन कार्बन डाईआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड और कई उडऩशील और अर्ध उडऩशील कार्बनिक रासायन होते हैं। सघनित होने पर टार एक चिपकने वाला भूरा पदार्थ बन जाता है। यह दांतों ही नहीं वरन फेफड़ों पर भी असर छोड़ता है। फेफडों द्वार अवशोषित टार वहां की कोशिकाओं की मृत्यु का कारण बनता है। यहीं से कैंसर की शुरूआत होती है। सिगरेट के जरिये एक व्यक्ति 48 ज्ञात कैंसरोत्पादकों का सेवन करता है।

“नशा नहीं जिन्दगी अपनाइए ” ये वाक्य हम काफी पहले से सुनते आ रहें है लेकिन फिर भी हम संजीदा नहीं है और देश में तम्बाकू सहित तमाम नशें की चीजों का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है ।  कई राज्यों में गुटखे पर प्रतिबंध है लेकिन बाजार में सब कुछ मिलता है। खुलेआम जहर बिक रहा है लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा। तम्बाकू विरोधी अभियानों पर दुनिया के देश जितना खर्च करते हैं, उससे पांच गुणा ज्यादा वे तम्बाकू पर टैक्स लगाकर कमाते हैं। दुनिया की मात्र पांच फीसदी आबादी धूम्रपान को हतोत्साहित करने के काम में लगी है। सिगरेट पीना पहले शौक होता है फिर आदत बन जाती है, आदत के बाद मजबूरी फिर बीमारी।

कुल मिलाकर हमें समय रहते तम्बाकू से होनें वाले खतरे के लिए संजीदा होना होगा नहीं तो आने वाले समय में ये काफी भयावह रूप धारण कर सकता है । हम सबको तम्बाकू से होने वाले ख़तरे के लिए सबसे पहले परिवार के स्तर पर बच्चों को बचपन से ही जागरूक करना होगा जिससे वह युवा अवस्था तक इससे सचेत रहे दुसरी बात गुटका और सिगरेट पर देश व्यापी रोक लगाने पर विचार कर सकते है । अगर पूरी तरह से रोक लगा पाना संभव ना हो तो इसके उत्पादन को घटाना होगा .कुलमिलाकर अब हमें तम्बाकू के खिलाफ ठोस अभियान चलाने की जरुरत है तभी इस समस्या से निजात मिल सकती है ।

 

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शशांक द्विवेदी
लेखक शशांक द्विवेदी चितौड़गढ, राजस्थाइन में मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च) है और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं। 12 सालों से विज्ञान विषय पर लिखते हुए विज्ञान और तकनीक पर केन्द्रित विज्ञानपीडिया डॉट कॉम के संचालक है । एबीपी न्यूज द्वारा विज्ञान लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान हासिल कर चुके शशांक को विज्ञान संचार से जुड़ी देश की कई संस्थाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया है। वे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं।
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