समाचार स्वास्थ्य की बात गांधी के साथ

कुदरती ईलाज़ का महत्व

Gandhi supported kerala when flood came there

स्वास्थ्य की बात गांधी के साथ वेब सीरीज का सातवे खंड में हम कुदरती ईलाज के महत्व पर चर्चा कर रहे हैं। अमित त्यागी महात्मा गांधी लिखित साहित्य से उन उद्धरणों को लेकर आए हैं, कुदरती ईलाज की अवधारणा के रेखांकित कर रही है यह रपट। संपादक

 
 
 
अमित त्यागी
कुदरती इलाज़ की प्रक्रिया में रामनाम को गांधी जी रोग मिटाने वाला मानते हैं। इस बारें मे वह लिखते हैं कि, वैद्यराज़ श्री गणेश शास्त्री मुझसे कहते हैं कि इसके संबंध का और इससे मिलता जुलता साहित्य आयुर्वेद मे काफी पाया जाता है। रोग को मिटाने में कुदरती इलाज़ का अपना बड़ा स्थान है और उसमें भी राम नाम विशेष है। हमें यह मानना चाहिए कि जिन दिनों चरक, वाग्भट्ट वगैरह ने लिखा है उन दिनों ईश्वर को राम नाम से पहचानने की रूढ़ि नहीं पड़ी थी। उस समय विष्णु के नाम की महिमा थी। आगे गांधी जी बताते हैं कि मैंने तो बचपन से ही राम नाम के जरिये ईश्वर को भजा है। राम धुन को माध्यम बनाया है। लेकिन मैं ये भी जानता हूं कि ईश्वर को ओम नाम से भजें या संस्कृत से या देश में उपलब्ध किसी भी अन्य भाषा से परिणाम एक ही होता है। ईश्वर को नाम की जरूरत नहीं है। वह और उसका कायदा एक ही है।
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ईश्वर नाम दवाओं की एक दवा है। हम न ईश्वर को पहचानते हैं और न ही निरंतरता के साथ राम नाम जपते हैं। यदि जपते हैं तो जबान से जपते हैं दिल से नहीं। ऐसा करने में हम तोते की ज़बान की नक़ल तो करते हैं उसके स्वभाव का अनुसरण नहीं। शायद यही कारण है कि हम राम धुन के माध्यम से निरोगी होने का मंत्र नहीं जान पाते। ऐसे लोग ईश्वर को सर्वरोगहारी के रूप मे नहीं पहचानते? और पहचाने भी तो कैसे ? यह दवा न तो वैद्य देते हैं न ही हकीम और न डॉक्टर। खुद वैद्यों, हकीमों, और डॉक्टरों को भी इस पर आस्था नहीं। यदि वे बीमारी को घर बैठे गंगा-सी यह दवा दे दें तो उनका धंधा कैसे चले। शायद इसलिए लोगों की नज़र में पुड़िया और शीशी ही राम बाण दवा है। जबकि वास्तविकता यह है कि सच्चे मन से राम धुन के माध्यम से राम का नाम जपा जाये तो ये ज़्यादा कारगर है। पर दवा देने से रोगी को मानसिक संतुष्टि मिलती है और हाथों हाथ फल भी देखने को मिलता है। जैसे फलां फलां ने मुझे चूरन दिया और मैं अच्छा हो गया। इस तरह से व्यापार चल निकलता है।
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हरिजन सेवक के 24 मार्च 1946 के अंक मे गांधी जी लिखते हैं, वैद्यो और डॉक्टरों के राम नाम रटने की सलाह देने से रोगी का दुख दूर नहीं होता। जब वैद्य स्वयं उसके चमत्कार को जानता हो, तभी रोगी को भी उसके चमत्कार का पता चलता है। राम नाम पोथी का बैंगन नहीं, वह तो अनुभव की प्रसादी है। जिसने उसका अनुभव प्राप्त किया है, वही वह दवा दे सकता हैं, अन्य नहीं। वैद्यराज़ ने मुझे चार मंत्र लिखकर दिये हैं। उनमें चरक ऋषि का मंत्र सीधा और सरल है। उसका अर्थ यूं है : चराचर के स्वामी विष्णु के हज़ार नामों से एक का भी जप करने से सब रोग शांत होते हैं।
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नोटः महात्मा गांधी ने जितने भी प्रयोग किए उसका मकसद ही यह था कि एक स्वस्थ समाज की स्थापना हो सके। गांधी का हर विचार, हर प्रयोग कहीं न कहीं स्वास्थ्य से आकर जुड़ता ही है। यहीं कारण है कि स्वस्थ भारत डॉट इन 15 अगस्त,2018 से उनके स्वास्थ्य चिंतन पर चिंतन करना शुरू किया है। 15 अगस्त 2018 से 2 अक्टूबर 2018 के बीच में हम 51 स्टोरी अपने पाठकों के लिए लेकर आ रहे हैं। #51Stories51Days हैश टैग के साथ हम गांधी के स्वास्थ्य चिंतन को समझने का प्रयास करने जा रहे हैं। इस प्रयास में आप पाठकों का साथ बहुत जरूरी है। अगर आपके पास महात्मा गांधी के स्वास्थ्य चिंतन से जुड़ी कोई जानकारी है तो हमसे जरूर साझा करें। यदि आप कम कम 300 शब्दों में अपनी बात भेज सकें तो और अच्छी बात होगी। अपनी बात आप हमें forhealthyindia@gmail.com  पर प्रेषित कर सकते हैं।
 

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