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तंदुरुस्ती के लिए सेवा धर्म का पालन जरूरी

स्वास्थ्य की बात गांधी के साथ वेब सीरीज की चौथी किस्त

स्वास्थ्य की बात गांधी के साथ शीर्षक से चल रहे वेब सीरीज का यह चौथा भाग है। इस भाग में हम महात्मा गांधी द्वारा लिखित पुस्तक ‘सेहत की कुंजी’ से शरीर के बारे में उनके विचार को प्रस्तुत कर रहे हैं। पुणे के आगा खां महल में रहते हुए उन्होंने इस विचार को 28.08.42 से लेकर 30.8.42 के बीच लिखा था। इस आलेख में महात्मा गांधी ने बहुत ही सहज शब्दों में शरीर की तंदुरूस्ती की बात कही है।

दरअसल, महात्मा गांधी ने जितने भी प्रयोग किए उसका मकसद ही यह था कि एक स्वस्थ समाज की स्थापना हो सके। गांधी का हर विचार, हर प्रयोग कहीं न कहीं स्वास्थ्य से आकर जुड़ता ही है। यहीं कारण है कि स्वस्थ भारत डॉट इन 15 अगस्त, 2018 से उनके स्वास्थ्य चिंतन पर चिंतन करना शुरू किया है। 15 अगस्त 2018 से 2 अक्टूबर 2018 के बीच में हम 51 स्टोरी अपने पाठकों के लिए लेकर आ रहे हैं। #51Stories51Days हैश टैग के साथ हम गांधी के स्वास्थ्य चिंतन को समझने का प्रयास करने जा रहे हैं। इस प्रयास में आप पाठकों का साथ बहुत जरूरी है। अगर आपके पास महात्मा गांधी के स्वास्थ्य चिंतन से जुड़ी कोई जानकारी है तो हमसे जरूर साझा करें। यदि आप कम कम 300 शब्दों में अपनी बात भेज सकें तो और अच्छी बात होगी। अपनी बात आप हमें forhealthyindia@gmail.com  पर प्रेषित कर सकते हैं। – संपादक


 
 
 
महात्मा गांधी
शरीर के परिचय से पहले आरोग्य किसे कहते हैं, यह समझ लेना ठीक होगा। आरोग्य से हमारा अभिप्राय हैं तन्दुरुस्त शरीर। जिसका शरीर व्याधि-रहित है, जिसका शरीर सामान्य काम कर सकता है, अर्थात् जो मनुष्य बगैर थकान के रोज दस-बारह मील चल सकता है, जो बगैर थकान के सामान्य मेहनत-म़जदूरी कर सकता है, सामान्य खुराक पचा सकता है, जिसकी इन्द्रियां और मन स्वस्थ हैं, ऐसे मनुष्य का शरीर तन्दुरुस्त कहा जा सकता है। इसमें पहलवानों या अतिशय दौड़ने-कूदने वालों का समावेश नहीं है। ऐसे असाधारण बलवाले व्यक्ति का शरीर रोगी हो सकता है। ऐसे शरीर का विकास एकांगी कहा जायगा।
इस आरोग्य की साधना जिस शरीर को करनी है, उस शरीर का कुछ परिचय आवश्यक है। प्राचीन काल में कैसी तालीम दी जाती होगी, यह तो विधाता ही जाने या शोध करने वाले लोग कुछ जानते होंगे। आधुनिक तालीम का थोड़ा-बहुत परिचय हम सबको है ही। इस तालीम का हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। शरीर से हमें सदा ही काम पड़ता है, मगर फिर भी आधुनिक तालीम से हमें शरीर का ज्ञान नहीं के बराबर होता है। अपने गांव और खेतों के बारे में भी हमारे ज्ञान का हाल यही है। अपने गांव और खेतों के बारे में तो हम कुछ भी नहीं जानते, मगर भूगोल और खगोल को तोते की तरह रट लेते हैं। यहां कहने का मतलब यह नहीं है कि भूगोल और खगोल का कोई उपयोग नहीं है, मगर हर एक चीज अपने स्थान पर ही अच्छी लगती है। शरीर के, घर के, गांव के, गांव के चारों ओर के प्रदेश के, गांव के खेतों में पैदा होने वाली वनस्पतियों के और गांव के इतिहास के ज्ञान का पहला स्थान होना चाहिये। इस ज्ञान के नींव पर खड़े दूसरे ज्ञान जीवन में उपयोगी हो सकते हैं।
शरीर पंचभूत का पुतला है
यही कारण है कि कवि ने गाया है:
पवन, पानी, पृथ्वी, प्रकाश और आकाश,
पंचभूत के खल से बना जगत का पाश।
इस शरीर का व्यवहार दस इन्द्रियों और मन के द्वारा चलता है। दस इन्द्रियों में पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं, अर्थात् हाथ, पैर, मुंह, जननेन्द्रिय और गुदा। ज्ञानेन्द्रियां भी पांच हैं- स्पर्श करने वाली त्वचा, देखने वाली आंख, सुनने वाला कान, सूंघने वाली नाक और स्वाद रस को पहचानने वाली जीभ। मन के द्वारा हम विचार करते हैं। कोई-कोई मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहते हैं। इन सब इन्द्रियों का व्यवहार जब सम्पूर्ण रीति से चलता है, तब शरीर पूर्ण स्वस्थ कहा जा सकता है। ऐसा आरोग्य बहुत ही कम देखने में आता है।
शरीर के अन्दर के विभाग हमें चकित कर देते हैं। शरीर जगत का एक छोटा सा मगर सम्पूर्ण नमूना है। जो शरीर में नहीं है, वह जगत में भी नहीं है। और जो जगत में है, वह शरीर में है। इसी संदर्भ में ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे’ यह महत्त्वपूर्ण कथन निकला है। इसलिए अगर हम शरीर को पूर्णतया पहचान सकें, तो जगत को पहचान सकते हैं।
दूसरी तरफ यह भी सच है कि जब बड़े-बड़े डॉक्टर, वैद्य और हकीम भी इसे पूरी तरह नहीं पहचान पाये, तो हमारे जैसे सामान्य प्राणी भला किस गिनती में हैं? आज तक ऐसे किसी यन्त्र की शोध नहीं हो पाई, जो मन को पहचान सके। शरीर के अन्दर और बाहर चलने वाली क्रियाओं का विशेषज्ञ लोग आकर्षक वर्णन दे सके हैं। मगर ये क्रियाएं कैसे चलती हैं, यह कोई बता सका है? मौत क्यों आती है, वह कब आयेगी, यह कौन कह सका है? अर्थात मनुष्य ने बहुत पढ़ा, विचार किया और अनुभव लिया, मगर परिणाम में उसको अपनी अल्पज्ञता का ही अधिक भान हुआ है।
शरीर के अन्दर चलने वाली अद्भुत क्रियाओं पर इन्द्रियों का स्वस्थ रहना निर्भर करता है। शरीर के सब अंग नियमानुसार चलें, तो शरीर का व्यवहार अच्छी तहर से चलता है। एक भी अंग अटक जाय, तो गाड़ी चल नहीं सकती। उसमें भी पेट अपना काम ठीक तरह से न करे, तो शरीर ढीला पड़ जाता है। इसलिए अपच या कब्जियत की जो लोग अवगणना करते हैं, वे शरीरके धर्म को जानते ही नहीं। इन दो रोगों से अनेक रोग उत्पन्न होते है।
शरीर का उपयोग क्या है?

हर एक च़ीज का सदुपयोग और दुरुपयोग हो सकता है। शरीर का उपयोग स्वार्थ के लिए, स्वेच्छाचार के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाय, तो वह उसका दुरुपयोग होगा। किन्तु यदि उसी शरीर का उपयोग सारे जगत की सेवा के लिए किया जाय और इस हेतु से संयम का पालन किया जाय, तो वह उसका सदुपयोग होगा। आत्मा परमात्मा का अंश है। उस आत्मा को पहचानने के लिए अगर हम इस शरीर का उपयोग करते हैं, तो शरीर आत्मा के रहने का मन्दिर बन जाता है।
शरीर को मल-मूत्र की खान कहा गया है। एक तरह से इस उपमा में कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है। परन्तु यदि शरीर केवल मल-मूत्र की खान ही हो, तो उसे संभालने के लिए इतने प्रयत्न करना कोई अर्थ नहीं रखता। परन्तु इसी ‘नरक की खान’ का सदुपयोग हो, तो उसे साफ-सुथरा रखकर उसे संभालना हमारा धर्म हो जाता है। हीरे और सोने की खान भी ऊपर से देखने पर तो मिट्टी की खान ही लगती है। पर उसमें हीरा और सोना है,  इसलिए मनुष्य उस पर लाखों रुपये खर्च करता है और उसके पीछे अनेक शास्त्रज्ञ अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं। तब आत्मा के मन्दिर-रूपी शरीर के लिए तो हम जितना भी करे उतना कम है।
हम इस जगत में जन्म लेते हैं जगत के प्रति अपना ऋण चुकाने के लिए, अर्थात् उसकी सेवा के लिए। इन दृष्टि बिन्दु को सामने रखकर मनुष्य अपने शरीर का संरक्षक बनता है। इसलिए शरीर की रक्षाके लिए हमें ऐसा यत्न करना चाहिये, जिससे वह सेवा धर्म का पालन पूरी तरह से कर सके।
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